By: Ravi Nitesh
देश के लगभग सभी शहरी क्षेत्रों और विशेषकर दिल्ली एनसीआर में इस तरह के हालत में स्कूली वैन्स देखना चिंताजनक है, लेकिन संजीदगी से देखने पर पता चलता है कि दरसल स्कूली वैन्स का यह मुद्दा एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जो हर रोज़ जोखिम भरा है और जिस पर सरकारी नियंत्रण होना आवश्यक है।
किसी भी साधारण प्राइवेट या सवारी गाडी के मुकाबले स्कूली वैन्स पर अधिक ध्यान देना ज़रूरी इसलिए है कि उसमें अधिक संख्या में अबोध बच्चे यात्रा करते हैं जो स्वयं संभावित जोखिमों या आपात स्थिति से बचने में उतने सक्षम नहीं हैं जितने वयस्क। दिल्ली एनसीआर में चलने वाली अधिकतर स्कूली वैन्स सरकारी या स्कूल के स्वामित्व में न होकर निजी तौर पर संचालित की जा रही है। ऐसे में इनके संचालन से सम्बन्धित नियंत्रक मानक पूरे नहीं किये जा रहे हैं।
सीधे तौर पर एक आम व्यक्ति भी देखकर यह बता सकता है कि जितनी ज़्यादा संख्या में इन वैन्स में बच्चे भरे जाते हैं, वह सीधे तौर पर मानकों का उल्लंघन है। कई वैन्स में तो बच्चे इस कदर ठूंसे जाते हैं कि उन्हें घुटन भी होती होगी। क्षमता से कहीं अधिक बच्चों के साथ यात्रा करती इन वैन्स के चालक ज़्यादा फेरे करने चक्कर में बहोत तेज़ और और मनमाने तरीके से वाहन चलाते हुए देखे जा सकते हैं। इनमें से कई चालक आवश्यक ड्राइविंग लाइसेंस रखते भी हैं या नहीं यह सदेहास्पद है। वैन्स में छोटे बच्चे यात्रा कर रहे होते हैं, ऐसे में केवल एक असत्यापित ड्राइवर के भरोसे उनको छोड़ देना भी विश्वासप्रद संचालन नहीं है।
इसके अतिरिक्त, इनमे से तमाम वैन्स की ढाँचागत स्थिति खराब है और वो देखने में ही जर्जर हैं। कई में CNG सिलिंडर्स लगे हैं जो किसी अधिकृत स्थान से लगवाए गए हैं या नहीं, उन पर लगी टेस्टिंग प्लेट असली है या नकली, वैन्स की निर्धारित सर्विस नियमित अंतराल पर हो रही है या नहीं, आदि तमाम ऐसे प्रश्न हैं जो अनुत्तरित हैं और इनमें चूक होने पर ये किसी भी दुर्घटना को बुलावा दे सकते हैं।
दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या सर्वविदित है, लेकिन स्कूल जाने वाले बच्चों पर इसके सीधे असर पर कम चर्चा होती है। पुरानी गाड़ियों या ठीक से रखरखाव न की गई वैन्स से निकलने वाले बारीक कण और नाइट्रोजन ऑक्साइड का स्तर अधिक होता है और इसलिए इस तरह की वैन्स का संचालन पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहा है।
यद्यपि लाखों परिवारों के लिए यह अनौपचारिक स्कूल वैन एक अनिवार्य सहारा है लेकिन जब इसे नगर नियोजन, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बच्चों की सुरक्षा और उनके विकास के नजरिए से देखा जाए, तो हजारों अनियमित और जीवाश्म ईंधन से चलने वाली वैनों पर दिल्ली की यह निर्भरता शहरी व्यवस्था की एक गंभीर कमी को उजागर करती है।
एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में लगभग 40,000 से अधिक निजी वैनें स्कूल कैब के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं, लेकिन इनमें से 10,000 से भी कम दिल्ली सरकार के परिवहन विभाग से पंजीकृत हैं। लगभग 30,000 से अधिक अनौपचारिक ईको-वैन, जो अक्सर पुरानी तकनीकों या अनधिकृत सीएनजी किट पर चलती हैं, बिना व्यावसायिक परमिट, अनिवार्य सुरक्षा जांच या स्पीड गवर्नर के रोज़ाना सड़कों पर दौड़ रही हैं। बच्चों के शोषण और उनकी सुरक्षा के मद्देनजर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी इस वाहनों के ऑडिट हेतु संस्तुति दी थी जिससे अभी तक कोई प्रभावी परिणाम धरातल पर नहीं दिखा।
स्कूल इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से बचते हैं और बच्चों को ऐसे वाहनों से भेजे जाने में अभिभावकों की जिम्मेदारी बताते हैं। ऐसे में केवल सरकार ही एक मात्र माध्यम है जिसको इस तरह के वाहनों को नियंत्रित करना होगा।
दिल्ली में एक सुगम व्यवस्था के अधीन स्कूल कैब्स का परिवहन विभाग में पंजीकरण और डिजिटल प्लेटफार्म पर इसकी जानकारी अनिवार्य की जानी चाहिए। साथ ही इस डिजिटल प्लेटफार्म में वाहन मालिक और चालक के दस्तावेज, कामर्शियल लाइसेंस की वैधता और साथ ही वाहन की वैधता, सीएनजी किट की वैधता, सीएनजी सिलेंडर की जानकारी और समय समय इसकी सर्विस और फिटनेस का रिकार्ड उपलब्ध होना चाहिए। सभी स्कूल कैब चालकों का पुलिस सत्यापन आवश्यक हो और एक पुलिस स्टेशन के अन्तर्गत आने वाले स्कूलों से संबद्ध सभी कैब की जानकारी पुलिस रिकॉर्ड में देना अनिवार्य किया जाए। स्कूली वैन्स में किसी भी अनधिकृत बदलाव को मंजूरी न दी जाय, बच्चों की संख्या को सख्ती से निर्धारित किया जाए और स्पीड गवर्नर लगाकर उनकी अधिकतम गति को निर्धारित किया जाए। वैन्स को जीपीएस और कैमरे लगाना अनिवार्य हो। वैन्स के अंदर और बाहर बड़े अक्षरों में टोल फ्री नंबर लिखे जाएँ और किसी आम नागरिक द्वारा भी किसी स्कूली वैन की शिकायत दर्ज की जा सके।




